शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा
उल्हासनगर: महानगरपालिका मुख्यालय में दो दिन पहले हुई घटना ने प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब २५ से ३० लोगों का समूह जबर्दस्ती प्रवेश कर हंगामा और बावला करता रहा, जबकि सुरक्षा रक्षक केवल मूकदर्शक बने रहे। सवाल उठ रहा है – क्या महानगरपालिका ने इन लोगों की एंट्री अपनी बुक में दर्ज की? क्या प्रशासन इन २५-३० लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की हिम्मत दिखाएगा?
जो संस्था खुद की सुरक्षा नहीं कर सकती, वह पूरे शहर की सुरक्षा और विकास कैसे सुनिश्चित करेगी? यह घटना सिर्फ एक सुरक्षा चूक नहीं, बल्कि उल्हासनगर की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था की नाकामी का प्रतीक बन गई है।
हालिया घटना और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
सोमवार को महानगरपालिका मुख्यालय में महापौर के पति कमलेश निकम और उनके समर्थकों के समूह ने जबर्दस्ती प्रवेश कर भाजपा नेताओं के खिलाफ घोषणाबाजी और हंगामा किया। रिपोर्ट्स के अनुसार समूह में ४०-५० लोग शामिल थे। सुरक्षा रक्षकों ने रोकने की कोशिश नहीं की। सामान्य नागरिकों से एंट्री पूछने वाले रक्षक बड़े समूह को रोक नहीं पाए। भाजपा ने कार्रवाई की मांग की है और पुलिस शिकायतें दर्ज हुई हैं।
यह घटना अकेली नहीं है। उल्हासनगर में पिछले कुछ समय में कई गंभीर घटनाएं हुई हैं:
- सितंबर २०२६ में टेंडर विवाद को लेकर महापालिका समिति सभापति और भाजपा नगरसेवक के बीच कार्यालय में हाथापाई, समर्थक भिड़े।
- अगस्त २०२६ में पुलिस के सामने दो गुटों में तुफान हाथापाई, २० से अधिक लोगों पर दंगा का मामला।
- युवाओं द्वारा धारदार हथियार लेकर सड़कों पर उत्पात, वाहनों की तोड़फोड़ और नागरिकों पर हमले।
- कैंप क्षेत्रों में गोलीबारी, हत्या और गुंडों के धुमाकूड़ की घटनाएं।
ये घटनाएं शहर में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़े करती हैं।
वंचित के अंदर भी फूट और अत्याचार का मामला
सिर्फ शिवसेना और भाजपा ही नहीं, वंचित बहुजन आघाड़ी भी अपनी गरिमा बचा नहीं पा रही। वंचित के जिला अध्यक्ष/प्रवक्ता मोनू सोनू पवार ने अपने ही दो नगरसेवकों – जो शिवसेना के साथ गठबंधन कर बैठे – के खिलाफ अत्याचार (Atrocity) का मामला दर्ज कराया है। ये दोनों नगरसेवक (सुरेखा सोनावणे और विकास खरात) पहले वंचित के टिकट पर चुने गए थे, लेकिन बाद में शिवसेना शिंदे गुट के साथ जाकर सत्ता समीकरण बदल दिए। इससे साफ होता है कि पार्टी के अंदर भी अनुशासन और निष्ठा टूट चुकी है।
नेताओं के ‘वास्तविक चेहरे’ और विकास पर असर
उल्हासनगर के नागरिक आज निराश हैं। सत्ता में बैठे शिवसेना, भाजपा और वंचित बहुजन आघाड़ी के नेता अपने पद की गरिमा और ईमानदारी साबित करने में विफल साबित हो रहे हैं। आपसी आरोप-प्रत्यारोप, ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ के आरोप, धमकियां और हिंसा सार्वजनिक मुद्दों और विकास कार्यों को पीछे धकेल रही है।
स्वीकृत नगरसेवक नियुक्ति को लेकर भाजपा-शिवसेना विवाद हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है। महायुति के अंदर फूट, पुलिस थाने में शिकायतें और व्यक्तिगत आरोप (कलानी समूह से जुड़ाव बनाम अन्य आपराधिक आरोप) राजनीति को अपराध और बदनामी का अखाड़ा बना रहे हैं। वंचित के कुछ नगरसेवकों ने भी पक्ष बदलकर समीकरण बदले।
नागरिकों की मांगें – सड़कें, पानी, स्वच्छता, सुरक्षा और विकास – इन सत्ता संघर्षों की भेंट चढ़ रही हैं। पद की गरिमा बनाए रखने में नाकाम ये नेता शहर के भविष्य के लिए खतरा बन रहे हैं।
जनता को सतर्क रहने की जरूरत
उल्हासनगर के विकास के लिए अब नागरिकों को सतर्क होना होगा। ऐसे उम्मीदवार चुनें जिनका रिकॉर्ड साफ हो, जो अपराध और हंगामे से दूर रहकर वास्तविक विकास पर ध्यान दें। वर्तमान सत्ताधारी दलों के व्यवहार ने साबित कर दिया है कि पद की गरिमा और जनहित उनके एजेंडे में नहीं है।
महानगरपालिका प्रशासन को तुरंत जवाब देना चाहिए – एंट्री रिकॉर्ड हुआ या नहीं? दोषियों पर कार्रवाई होगी या नहीं? सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाएगी या नहीं?
शहर की सुरक्षा और विकास ‘रामभरोसे’ नहीं चल सकता। जनता को अब जागरूक होकर सही विकल्प चुनना होगा। अन्यथा उल्हासनगर विकास की दौड़ में और पिछड़ता जाएगा।
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