उल्हासनगर महानगरपालिका: युती के बाद गंदी राजनीति का खुला खेल, महिला आरक्षण का दावा फेल, गुंडागर्दी पर चुप्पी

शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा 

उल्हासनगर महानगरपालिका (यूएमसी) में सत्ताधारी युती के शासनकाल में राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है। एक ओर ३३ प्रतिशत महिला आरक्षण का नारा, दूसरी ओर नामांकन में एक भी महिला का फॉर्म नहीं। सार्वजनिक रूप से अस्वीकृत चेहरों को दोबारा मौका, एफआईआर के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं और महापौर फंड का कोई ठोस नतीजा नजर नहीं आ रहा।

बीजेपी महिला आरक्षण का दावा बना खोखला


बीजेपी लगातार ३३ प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी का दावा करती रही है। लेकिन कोप फॉर्म भरते समय एक भी महिला उम्मीदवार का फॉर्म दाखिल नहीं हुआ। यह दोहरा रवैया पार्टी के अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

पब्लिक रिजेक्टेड चेहरों को दोबारा मौका


बीजेपी और शिवसेना उन लोगों को फिर से टिकट या मौका दे रही है जिन्हें जनता पहले ही खारिज कर चुकी है। शिवीसेना छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए कुछ लोग अब सेना से फॉर्म भरते दिख रहे हैं। जनता द्वारा अस्वीकृत चेहरे भी नामांकन प्रक्रिया में सक्रिय हैं।

गुंडागर्दी और एफआईआर पर सन्नाटा

कुछ नगरसेवकों पर खुलेआम गुंडागर्दी के आरोप हैं। एफआईआर दर्ज हुई, यूएमसी की संपत्ति को नुकसान पहुंचा, फिर भी न कोई आवाज उठी और न कोई ठोस कार्रवाई हुई।

वंचित बहुजन पार्टी में भी विवाद

युती में महापौर पद दिलाने वाली वंचित बहुजन पार्टी में आंतरिक क्लेश है। पार्टी के कुछ नेताओं पर अत्याचार अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज है। बाबासाहेब की तस्वीर लगाकर जगह हड़पने का आरोप भी लगा है। ये लोग यूएमसी परिसर में नारेबाजी करते हुए फॉर्म भर रहे हैं। सवाल उठता है—क्या राजनीतिक समर्थन संविधान से ऊपर है?

महापौर फंड और काम का अभाव

महापौर प्रतिनिधि दावा करते हैं कि ५५० करोड़ रुपये की निधि लाई गई है। लेकिन इस राशि से हुए ठोस विकास कार्य जनता को नजर नहीं आ रहे। “महापौर आपल्या दारी” जैसी योजनाओं में बीजेपी कभी सक्रिय नहीं दिखी। जनता में नाराजगी बढ़ रही है।

एंटिलिया घाट विवाद बढ़ा

शौर्य टाइम्स ने पहले भी एंटिलिया घाट का मुद्दे पर न्यूज चलाया था। अब स्थिति और विडंबनापूर्ण हो गई है। 

एंटिलिया घाट बंद कर रेजेंसी में विसर्जन की अनुमति दी गई है, जहां पूरे सेंचुरी का केमिकल युक्त पानी छोड़ा जाता है।


युती के बाद से एक भी महापालिका सभा शांतिपूर्ण तरीके से नहीं हुई।

जनता अब सवाल पूछ रही है—क्या यह विकास की राजनीति है या केवल सत्ता और संरक्षण की?

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