शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा
बुद्धभूमि फाउंडेशन ने प्रदूषण नियंत्रण और नदी के पुनर्जीवन के लिए सौंपा पत्र; औद्योगिक इकाइयों की जांच, दूषित पानी के स्रोतों की पहचान और जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई की मांग
अंबरनाथ, उल्हासनगर और कल्याण क्षेत्र से होकर बहने वाली वालधुनी नदी के प्रदूषण का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। बुद्धभूमि फाउंडेशन ने 13 अक्टूबर 2026 को अंबरनाथ नगर परिषद और उल्हासनगर महानगरपालिका के आयुक्त को पत्र सौंपकर नदी के प्रदूषण पर तत्काल नियंत्रण, वैज्ञानिक जांच और पुनर्जीवन के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।
फाउंडेशन के पत्र में नदी में रासायनिक एवं औद्योगिक अपशिष्ट, दूषित पानी और नालों के माध्यम से प्रदूषण पहुंचने की आशंका जताई गई है। संगठन का कहना है कि इस समस्या को केवल स्थानीय सफाई तक सीमित रखने के बजाय समन्वित पर्यावरणीय प्रबंधन और जवाबदेही के साथ हल किया जाना चाहिए।
क्या हैं फाउंडेशन की प्रमुख मांगें?
बुद्धभूमि फाउंडेशन ने अपने पत्र में संबंधित प्रशासनिक विभागों और प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों से निम्नलिखित कदम उठाने की मांग की है:
- प्रदूषण के स्रोतों की पहचान: नदी में मिलने वाले नालों और औद्योगिक अपशिष्ट के स्रोतों का सर्वेक्षण कर प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों की पहचान की जाए।
- वैज्ञानिक जल जांच: नदी के विभिन्न हिस्सों से नमूने लेकर BOD, COD, pH, TDS, घुलित ऑक्सीजन (DO) और भारी धातुओं की जांच की जाए।
- औद्योगिक इकाइयों की जांच: केमिकल, वॉशिंग, डाइंग और प्रोसेसिंग इकाइयों के अपशिष्ट निस्तारण की जांच कर नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई की जाए।
- सीवेज व्यवस्था में सुधार: नालों के दूषित पानी को नदी में जाने से रोकने के लिए इंटरसेप्टर सीवर, पंपिंग स्टेशन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) जैसी व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जाए।
- प्रदूषण की ऑनलाइन निगरानी: महत्वपूर्ण स्थानों पर जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी और औचक निरीक्षण की व्यवस्था लागू की जाए।
- नदी का पुनर्जीवन: नदी किनारों पर हरित क्षेत्र विकसित करने, जैव विविधता की रक्षा करने और प्रदूषित गाद के सुरक्षित निस्तारण के लिए योजना बनाई जाए।
- जिम्मेदारों से पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति: प्रदूषण के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले उद्योगों या संस्थानों से नियमानुसार पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति वसूलने की मांग की गई है।
समयबद्ध कार्रवाई का प्रस्ताव
पत्र में प्रदूषण नियंत्रण के लिए चरणबद्ध समयसीमा भी सुझाई गई है। इसमें 30 दिनों के भीतर प्रदूषण स्रोतों का सर्वेक्षण एवं मापन, तीन महीने में अनधिकृत प्रदूषण स्रोतों पर कार्रवाई, छह महीने में नालों और सीवेज व्यवस्था में सुधार तथा 12 से 24 महीने के भीतर नदी के पुनर्जीवन और जल गुणवत्ता में सुधार के लक्ष्य शामिल हैं।
फाउंडेशन ने जिला स्तर पर विशेष निगरानी समिति गठित करने और संबंधित विभागों की कार्रवाई की रिपोर्ट यानी Action Taken Report (ATR) लिखित रूप में उपलब्ध कराने की भी मांग की है।
प्रशासन के सामने चुनौती
वालधुनी नदी के संरक्षण के लिए केवल सफाई अभियान पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए औद्योगिक अपशिष्ट पर नियंत्रण, घरेलू सीवेज का उचित उपचार, नियमित जल परीक्षण और संबंधित निकायों के बीच समन्वय आवश्यक है। साथ ही, प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों और जिम्मेदार इकाइयों की पहचान वैज्ञानिक जांच तथा आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर की जानी चाहिए।
अब सवाल यह है कि अंबरनाथ नगर परिषद, उल्हासनगर महानगरपालिका, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB) और अन्य संबंधित विभाग इस मांग पर क्या कदम उठाते हैं। नदी के प्रदूषण को रोकने के लिए ठोस कार्रवाई, समयबद्ध लक्ष्य और पारदर्शी निगरानी व्यवस्था इस मामले में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
नोट: यह समाचार बुद्धभूमि फाउंडेशन द्वारा 13 अक्टूबर 2026 को जारी पत्र में दर्ज मांगों पर आधारित है। पत्र में उठाए गए आरोपों और आशंकाओं की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि तथा संबंधित प्रशासन का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी समाचार में शामिल किया जाना चाहिए।
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