जूने शिवसैनिकों को न्याय या नए चेहरों को मलाई? उल्हासनगर शिवसेना शहर प्रमुख पद के लिए आज 'इंटरव्यू', सियासी हलकों में मचा घमासान


 शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा 

शिवसेना में पारंपरिक तौर पर शीर्ष नेतृत्व का 'आदेश' ही अंतिम फैसला माना जाता रहा है। संगठन के इतिहास में पहली बार उल्हासनगर में शहर प्रमुख, विभाग प्रमुख और शाखा प्रमुख जैसे अहम सांगठनिक पदों के लिए बाकायदा 'डायरेक्ट इंटरव्यू' की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। आज यानी 23 अक्टूबर को उल्हासनगर स्थित सांसद (खासदार) कार्यालय में यह बहुचर्चित चयन प्रक्रिया आयोजित की गई है।

इस साक्षात्कार पैनल में शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता आनंद परांजपे, शिवसेना सचिव भाऊसाहेब चौधरी और कल्याण लोकसभा के जिला प्रमुख गोपाल लांडगे उपस्थित रहेंगे, जो दावेदारों की योग्यता और जनाधार का आकलन करेंगे।

शहर प्रमुख की रेस में दिग्गज नाम

उल्हासनगर विधानसभा क्षेत्र में सांगठनिक वर्चस्व को लेकर मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प हो चुका है। रेस में तीन मुख्य नाम सबसे आगे चल रहे हैं:

  • विक्की भुल्लर (संगठन में सक्रिय और आक्रामक दावेदार)
  • ओमी कालानी (कालानी परिवार का स्थानीय सिंधी वोट बैंक और समर्थकों का मजबूत आधार)
  • जम्मु पुरुस्वानी (स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में पकड़ रखने वाले नेता)

पुराने निष्ठावान बनाम नए दावेदार: बगावत की आशंका?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस इंटरव्यू के बाद लिए जाने वाले फैसले का सीधा और दूरगामी असर आगामी लोकसभा और विधानसभा  चुनावों पर पड़ेगा। जमीन पर वर्षों से संगठन का झंडा थामने वाले पुराने शिवसैनिकों के भीतर यह असंतोष पनप रहा है कि क्या सालों के पसीने और वफादारी का इनाम मिलेगा, या फिर बाहर से आए नए चेहरों को मलाईदार पद सौंप दिए जाएंगे।

गौरतलब है कि उल्हासनगर 4 और 5 के लिए दो महीने पहले ही सचिन कदम को शहर प्रमुख की कमान सौंपी जा चुकी है। 

 

अब देखना यह होगा कि क्या उल्हासनगर 1, 2 और 3 में भी पुराने शिवसैनिकों को दरकिनार कर किसी बाहरी या हाल ही में शामिल हुए चेहरे को जिम्मेदारी दी जाती है, या संगठन संतुलन साधने में सफल रहता है।


निष्पक्षता पर सवाल: आनंद परांजपे और कालानी समीकरण

पार्टी के भीतर चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर भी कानाफूसी तेज है। दरअसल, इंटरव्यू पैनल के प्रमुख चेहरे आनंद परांजपे पूर्व में शिवसेना छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में लंबा समय बिता चुके हैं और हाल ही में उनकी शिवसेना में घर वापसी हुई है।

स्थानीय राजनीतिक गलियारों में यह बात किसी से छुपी नहीं है कि एनसीपी के दौर से ही आनंद परांजपे और कालानी परिवार के रिश्ते बेहद करीबी और मजबूत रहे हैं। ऐसे में पुराने शिवसैनिकों के मन में यह शंका उठ रही है कि कहीं इस चयन प्रक्रिया में पूर्व राष्ट्रवादी पृष्ठभूमि और निजी रिश्तों का झुकाव नए शिवसैनिकों के पक्ष में तो नहीं जाएगा?

शीर्ष नेतृत्व की साख दांव पर

आदेश की परंपरा छोड़कर इंटरव्यू का रास्ता अपनाना संगठन को आधुनिक व लोकतांत्रिक दिखाने का प्रयास हो सकता है, लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए यह साख की लड़ाई बन चुका है। यदि शीर्ष नेतृत्व ने पुराने शिवसैनिकों की भावनाओं को अनदेखा किया, तो चुनावी समर में भीतरघात का बड़ा खतरा पैदा हो सकता है।

 उल्हासनगर के सांसद कार्यालय में आज होने वाली इस हलचल पर रणनीतिकारों की नजरें टिकी हुई हैं।


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