उल्हास नदी के सीने पर कंक्रीट का 'अवैध' प्रहार: सरकारी नोटिसों को ठेंगा दिखाकर एंटिलिया घाट को 'पर्यटन व धार्मिक स्थल' का दर्जा दिलाने की तैयारी!





 शौर्य टाईम्स : नीतू विश्वकर्मा 

जलसंपदा विभाग और SDO के काम रोकने के आदेशों की अनदेखी; RTI खुलासे में नहीं मिली कोई वैध अनुमति

• सैकड़ों पेड़ों की बलि और नदी के प्राकृतिक प्रवाह से छेड़छाड़ पर पर्यावरणविदों का फूटा गुस्सा, महासभा में प्रस्ताव खारिज करने की मांग

उल्हासनगर कैंप-1, म्हारळ स्थित 'रीजेंसी एंटिलिया' परिसर के पास बहने वाली जीवनदायिनी उल्हास नदी के अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। नदी के मूल प्राकृतिक प्रवाह (पात्र) के भीतर करीब 350 मीटर लंबा और 150 मीटर चौड़ा भारी-भरकम सीमेंट-कंक्रीटीकरण करके घाट का निर्माण बदस्तूर जारी है। 

अब इस विवादास्पद निर्माण को आधिकारिक तौर पर 'पर्यटन एवं धार्मिक स्थल' घोषित कराने के लिए उल्हासनगर विधानसभा क्षेत्र के स्थानीय विधायक कुमार आयलानी के प्रस्ताव को नगर निगम की महासभा में मंजूरी के लिए लाया जा रहा है। दूसरी ओर, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और 'उल्हास-वालधुनी सरिता संवर्धन अभियान' ने सरकारी नोटिसों व आरटीआई दस्तावेजों का हवाला देते हुए इसे नदी का विनाश करार दिया है।

सरकारी आदेशों और नोटिसों की खुली अवहेलना

सूचना का अधिकार (RTI) और सरकारी पत्राचार से मिले आधिकारिक दस्तावेजों से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं:
ठाणे जलसंपदा (पाटबंधारे) विभाग का स्पष्ट निर्देश:
कार्यकारी अभियंता, ठाणे पाटबंधारे विभाग द्वारा उल्हासनगर मनपा आयुक्त, केडीएमसी आयुक्त और संबंधित अधिकारियों को पत्र जारी कर स्पष्ट किया गया था कि नदी के 'ब्लू लाइन' और 'रेड लाइन' (बाढ़ रेखा) क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अनधिकृत निर्माण, भराव या कंक्रीटीकरण नियमों का खुला उल्लंघन है। विभाग ने इस अवैध कंक्रीटीकरण और प्राचीन वृक्षों की कटाई को तुरंत रोकने के निर्देश दिए थे।
उपविभागीय अधिकारी (SDO) का आदेश:
उल्हासनगर उपविभागीय अधिकारी (SDO) कार्यालय ने भी 6 जून 2024 को पत्र जारी कर रीजेंसी एंटिलिया के पास उल्हास नदी तट पर जारी अवैध निर्माण व कंक्रीटीकरण को तत्काल रोकने और जांच कर उचित कार्रवाई करने का निर्देश मनपा प्रशासन को दिया था।

दिवंगत पर्यावरणविद् सरिता खानचंदानी की मुहिम:
हिराली फाउंडेशन की पूर्व अध्यक्षा दिवंगत एड. सरिता खानचंदानी ने नदी के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने, अनधिकृत भराव और सैकड़ों वर्षों पुराने विरासत वृक्षों (Heritage Trees) की कटाई के खिलाफ कड़ा कानूनी विरोध दर्ज कराते हुए प्रशासन को लीगल नोटिस थमाए थे।

RTI का बड़ा खुलासा: न कोई वैध अनुमति, न पर्यावरण मंजूरी!

आरटीआई कार्यकर्ता राजेंद्रसिंह भुल्लर द्वारा मांगी गई जानकारी में मनपा सार्वजनिक निर्माण विभाग ने यह स्पष्ट स्वीकार किया है कि:
उक्त निर्माण कार्य के लिए जलसंपदा या सक्षम पर्यावरण प्राधिकरणों से आवश्यक वैधानिक अनुमतियों का अभाव रहा है।

घाट तक जाने के लिए कोई स्वतंत्र सार्वजनिक सरकारी मार्ग तक नहीं है, बल्कि यह रीजेंसी एंटिलिया सोसायटी के निजी रास्ते से होकर गुजरता है।
इसके बावजूद, विधायक निधि व अन्य विकास निधियों के माध्यम से करोड़ों रुपये खर्च कर नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में भारी कंक्रीटीकरण कर दिया गया।

'हरिद्वार की तर्ज पर विकास' या पर्यावरण का विध्वंस?

विधायक कुमार आयलानी ने जिला प्रशासन और शासन को पत्र लिखकर मांग की है कि:

"उक्त घाट पर सिंधी, उत्तर भारतीय व अन्य समाज द्वारा गणेश विसर्जन, दुर्गा पूजा, छठ पूजा और गंगा आरती जैसे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं। इसे हरिद्वार के घाटों की तर्ज पर पर्यटन एवं धार्मिक स्थल के रूप में विकसित किया जाए और आवश्यक नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।"

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का पलटवार:

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सामाजिक संगठनों का कहना है कि:
क्या नदी के आधे प्राकृतिक प्रवाह को पाटकर, अवैध खनन-उत्खनन कर और सैकड़ों पेड़ों की बलि देकर कोई धार्मिक या पर्यटन स्थल बनाया जा सकता है? आस्था और धर्म के नाम पर नदी के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और जैव विविधता की हत्या करना कतई स्वीकार्य नहीं है।"

महासभा में प्रस्ताव रद्द करने और कंक्रीट हटाने की पुरजोर मांग

'उल्हास-वालधुनी सरिता संवर्धन अभियान' और स्थानीय सजग नागरिकों ने मांग की है कि:

प्रस्ताव तुरंत खारिज हो: उल्हासनगर महानगरपालिका की महासभा में जनप्रतिनिधि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज करें।
अवैध ढांचा ध्वस्त किया जाए: सरकारी आदेशों का सम्मान करते हुए नदी के जलभराव क्षेत्र से अवैध सीमेंट कंक्रीट को तत्काल हटाकर नदी के मूल प्राकृतिक प्रवाह को बहाल (Reclaim) किया जाए।

जिम्मेदारों पर एफआईआर दर्ज हो: बिना अनुमति नदी पात्र में भराव करने, अवैध खनन और पेड़ों की कटाई कराने वाले जिम्मेदार अधिकारियों और संवेदकों पर पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

बड़ा सवाल: जब खुद सरकारी महकमे (जलसंपदा व SDO) निर्माण को अवैध ठहराते हुए रोकने का आदेश दे चुके हैं, तो क्या आस्था और पर्यटन के नाम पर इस 'अवैध कंक्रीटीकरण' को वैध बनाने की कोशिश सफल होगी या प्रशासन नदी को मुक्त कराने का साहस दिखाएगा?





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